सरहदें

नायक सुशील कुमार
उम्र - 22 वर्ष
ब्लड ग्रुप - ओ +
यूनिट - 14 मराठा 

अस्पताल में अपने बिस्तर पर लेटे हुए सुशील की नज़रें अनायास ही अपने बेड के दाहिने छोर पर लगी इस पर्चे पर चली जाती थी । तीन हफ़्ते गुज़र चुके थे लड़ाई को पर उसकी ज़िन्दगी तो अब बस इस बिस्तर तक ही सीमित रह गयी थी । इस जंग ने उससे उसकी आज़ादी छीन ली थी । जंग में गया तो था भारत माँ का एक वीर सपूत था , एक नौजवान जिसकी नसों में देशभक्ति का लावा धधक रहा था , पर जो लौट कर आया वो एक अपाहिज था जिसने जंग तो जीत ली थी पर  किस्मत से हार गया था और धीरे धीरे मौत के आगोश में समाता जा रहा था । 

तीन हफ्तों के बाद भी सुशील इस बात का विश्वास नहीं कर पा रहा था की अब उसकी टाँगे नहीं रहीं । उसके लिए ये सब एक बुरे सपने जैसा था जो ख़तम ही नहीं हो रहा था । उन निर्जीव जाँघों में उसे अभ भी हलचल महसूस हो रही थी । आँखें बता रही थी की अब नहीं हैं तुम्हारे पास पाँव पर उसका दिमाग ये मानने को तैयार नहीं था ।

तभी बेड नंबर 17 को बाहर निकाल जाने लगा । सुशील मुस्कुराया , एक ऐसी मुस्कान जो उसकी किस्मत को ताना मार रही हो की मैं जानता हूँ यह मेरे साथ भी जल्दी ही होगा ।

अगली सुबह बेड नंबर 17 फिर भर चुका था । इस बार उसमें था एक पाकिस्तानी सिपाही , असलम । अपनी प्लाटून का सिर्फ वही एक जीवित सदस्य बचा था । उसके चेहरे पर गोली लगी थी और कमर के नीचे का पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो चुका था । उसे मानवता की बिनाह पर भारत में उपचार के लिए लाया गया था ।
हालाँकि सबके मन में उस मुल्क़ के लिए नफ़रत थी जहां से वो आया था पर हर दिल से उसके लिए दुआ ही निकल रही थी । उसकी इस दशा को देख सबका मन पसीजा था ।
सुशील और असलम एक ही वार्ड में थे । दोनों ही असहनीय दर्द से गुज़रते हुए अपने अपने बिस्तर पर लेटे थे । चूँकि , वार्ड में कुछ ही लोग थे , तो सबको एक दूसरे के होने का आभास था । असलम के बारे में ही ज्य़ादातर बातें होती थी । उसके परिवार के बारे में भी पता लगाने की कोशिश ज़ारी थी । उसकी हालत देख कर हर एक आँख नम थी सिवाय सुशील के । जिसने भी इसका कारण पूंछा तो बड़े रूखेपन से सुशील ने एक ही रटा रटाया जवाब दिया की इसके और इसके देश के कारण ही मैं अपनी सारी ज़िन्दगी अपाहिज रहूँगा या शायद मर भी जाऊं । नहीं , मैं इसे या इसके देश को कभी नहीं माफ़ कर सकता ।

एक और सुबह , एक और ख़ाली बेड । इस बार यह सुशील का था । एक काली सुबह थी वो । अपने साथी को बिछड़ते देख जो चार हफ़्तों तक उनके साथ रहा था , सबका दिल बैठा जा रहा था ।
बाहर बारिश हो रही थी , वैसी नहीं जैसी हमेशा होती है । ऐसा लग रहा था की भगवान भी एक वीर सिपाही की शाहादत का शोक मना रहें हों जिसकी ज़िन्दगी को एक बार फिर शरहदों की जंग ने क्रूरता से छीन लिया हो ।
बाहर टेलीविजनों पर सुशील को वीर चक्र देने की घोषणा हो चुकी थी । नेता उसे देश का वीर सपूत कह रहे थे और उसके नाम पर किसी सड़क का नाम रखने का ऐलान कर रहे थे । विपक्ष की मांग थी कि सड़क नहीं , हवाई अड्डा बने सुशील के नाम पर । 

सुशील और ना जाने कितने की सिपाहियों की जाने ये समझाने में जा चुकी थी कि जंग का परिणाम सिवाय बर्बादी के कुछ नहीं होता । दोनों देश अपनी अपनी तरफ़ युद्ध में विजयी होने का दंभ भर रहे थे ।
सुशील का बेड बाहर निकाला जा रहा था । वो एक सिपाही जिसकी तरफ़ उसने देखा तक नहीं था , उसका सिर भी सुशील के लिए सजदे में झुका  हुआ था और दोनों आँखों से आंसू बह रहे थे। जिस इंसान को देख ऐसा लगता था की वो असलम से नफ़रत करता है , उसने अपनी मृत्यु पर उसे एक ऐसा तोहफ़ा दिया जो हर सरहद को मिटाने में सक्षम है ।  वो तोहफ़ा था प्यार का ।

असलम जी भर के देख लेना चाहता था इस वीर सिपाही को जिसके कारण आज एक बार फिर वो देख पा रहा था । जो अपनी मौत से पहले अपनी दोनों आँखें असलम को दान करने को कह गया । जो मरते मरते भी दुनिया को प्यार का , शान्ति का ,अमन का पैग़ाम दे गया ।
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Pic Courtesy: Pixabay.com

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